काली दस महाविद्या में प्रथम रूप है। माना जाता है माँ ने ये काली रूप दैत्यों के संहार के लिए लिया था। जीवन की हर परेशानी व दुःख दूर करने के लिए इनकी आराधना की जाती है। माता का यह रूप साक्षात और जाग्रत है। काली के रूप में माता का किसी भी प्रकार से अपमान करना अर्थात खुद के जीवन को संकट में डालने के समान है। महा दैत्यों का वध करने के लिए माता ने ये रूप धरा था। सिद्धि प्राप्त करने के लिए माता की वीरभाव में पूजा की जाती है। काली माता तत्काल प्रसन्न होने वाली और तत्काल ही रूठने वाली देवी है। अत: इनकी साधना या इनका भक्त बनने के पूर्व एकनिष्ठ और कर्मों से पवित्र होना जरूरी होता है।
यह कज्जल पर्वत के समान शव पर आरूढ़ मुंडमाला धारण किए हुए एक हाथ में खड्ग दूसरे हाथ में त्रिशूल और तीसरे हाथ में कटे हुए सिर को लेकर भक्तों के समक्ष प्रकट होने वाली काली माता को नमस्कार। यह काली एक प्रबल शत्रुहन्ता महिषासुर मर्दिनी और रक्तबीज का वध करने वाली शिव प्रिया चामुंडा का साक्षात स्वरूप है, जिसने देव-दानव युद्ध में देवताओं को विजय दिलवाई थी। इनका क्रोध तभी शांत हुआ था जब शिव इनके चरणों में लेट गए थे।
काली माता का मंत्र हकीक की माला से नौ माला ‘ ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिका क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं स्वाहा ‘ मंत्र का जाप करें।
काली महाविद्या साधना
Kali Mahavidya Sadhna
काली महाविद्या साधना: साधक रात्रि 9 बजे के समय स्नान कर शुद्ध काले वस्त्र धारण कर अपने घर में किसी एकान्त स्थान या पूजा कक्ष में दक्षिण दिशा की तरफ़ मुख करके बैठे तथा अपने सामने चौकी पर काले रंग का वस्त्र बिछाकर उस पर प्लेट स्थापित कर उस प्लेट में रोली या काजल से त्रिकोण बनाये उस पर मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त ‘महाकाली यंत्र स्थापित करें. यंत्र के सामने शुद्ध तेल का दीपक लगाएं और मन्त्र विधान अनुसार संकल्प आदि कर सीधे हाथ में जल लेकर विनियोग करे.
विनियोग: ॐ अस्य श्री दक्षिण कालिका मन्त्रस्य भैरव ऋषि रुष्णि दक्षिण कालिका देवता ह्रीं बीजं हूं शक्ति: क्रीं कीलकं ममा भीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोग:
ऋष्यादि न्यास: बाएँ हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ की समूहबद्ध, पांचों उंगलियों से निम्न मंत्रों के साथ शरीर के विभिन्न अंगों को स्पर्श करें और ऐसी भावना मन में रखें कि वे सभी अंग तेजस्वी और पवित्र बन रहे है। ऐसा करने से अंग शक्तिशाली बनते है और चेतना प्राप्त होती है।
भैरवऋषये नम: शिरसि (सर को स्पर्श करें)
उष्णिक् छन्दसे नम: मुखे (मुख को स्पर्श करें)
दक्षिणकालिकादेवतायै नम: ह्रदये (ह्रदय को स्पर्श करें)
ह्रीं बीजाय नमो गुहे (गुप्तांग को स्पर्श करें)
हूं शक्तये नम: पादयोः (पैरों को स्पर्श करें)
क्रीं कीलकाय नम: नाभौ (नाभि को स्पर्श करें)
विनियोगाय नम: सर्वांगे (पूरे शरीर को स्पर्श करें)
कर न्यास : अपने दोनों हाथों के अंगूठे से अपने हाथ की विभिन्न उंगलियों को स्पर्श करें, ऐसा करने से उंगलियों में चेतना प्राप्त होती है।
ॐ क्रां अंगुष्ठाभ्यां नम: ।
ॐ क्रीं तर्जनीभ्यां नम: ।
ॐ क्रूं मध्यमाभ्यां नम: ।
ॐ क्रैं अनामिकाभ्यां नम: ।
ॐ क्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नम: ।
ॐ क्र: करतलकरपृष्ठाभ्यां नम: ।
ह्रदयादि न्यास: पुन: बाएँ हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ की समूहबद्ध, पांचों उंगलियों से निम्न मंत्रों के साथ शरीर के विभिन्न अंगों को स्पर्श करें और ऐसी भावना मन में रखें कि वे सभी अंग तेजस्वी और पवित्र बन रहे है। ऐसा करने से अंग शक्तिशाली बनते है और चेतना प्राप्त होती है।
ॐ क्रां ह्रदयाय नम: (ह्रदय को स्पर्श करें)
ॐ क्रीं शिरसे स्वाहा (सिर को स्पर्श करें)
ॐ क्रूँ शिखायै वषट् (शिखा को स्पर्श करें)
ॐ क्रैं कवचाय हुम् (दोनों कंधों को स्पर्श करें)
ॐ क्रौं नेत्रत्रयाय वौषट (दोनों नेत्रों को स्पर्श करें)
ॐ क्र: अस्त्राय फट् (सिर के ऊपर से ऊँगली घुमाकर चारों दिशाओं में चुटकी बजाएं)
ध्यान : इसके बाद दोनों हाथ जोड़कर माँ भगवती महाकाली का ध्यान करते हुए नीचे दिए गए मन्त्र का जाप करें।
शवारुढ़ाम्महा भीमां घोरदंष्ट्रां हसन्मुखीम् ।
चतुर्भुजां खड्ग मुण्डवरा भयकरां शिवाम् ।।
मुण्ड मालाधरान्देवी लोलजिह्वान्दिगम्बरां ।
एवं संचिन्तयेत्काली शमशानालयवासिनीम्।।
पूजन सम्पन्न कर सिद्ध प्राण प्रतिष्ठित “रुद्राक्ष माला” से निम्न मंत्र की 23 माला 11 दिन तक मंत्र जप करें, मन्त्र जाप के पश्चात् काली कवच का पाठ करें—
मन्त्र:
।। क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं स्वाहा ।।
काली जगन्मंगल कवच:
ॐ शिरों मे कालिका पातु क्रीडान्कारैकाक्षरी परा ।
क्रीं क्रीं क्रीं मे ललाटं च कालिका खड्गधारिणी ।।1।।
हुँ हुँ पातु नेत्रयुग्मं ह्रीं ह्रीं पातु श्रुती मम ।
दक्षिणे कालिके पातु ध्राणयुग्मं महेश्वरी ।।2।।
क्रीं क्रीं क्रीं रसनां पातु हुँ हुँ पातु कपीलकम् ।
वदनं सकलं पातु ह्रीं ह्रीं स्वाहास्वरूपिणी ।।3।।
द्वात्रिंशत्यक्षरी स्कन्धौ महाविद्या सुखप्रदा ।
खड्गमुंडधरा काली सर्वांग्मभितो मम ।।4।।
क्रीं हुँ ह्रीं त्र्यक्षरी पातु चामुण्डा ह्रदय मम।
ऐं हुँ ॐ ऐं स्तनद्वन्द्वम् ह्रीं फट् स्वाहा ककुत्स्थलम् ।।5।।
अष्टाक्षरी महाविद्या भुजौ पातु सकर्त्रिका ।
क्रीं क्रीं हुँ हुँ ह्रीं ह्रीं करौ पातु षडक्षरी मम ।।6।।
क्रीं नाभिमध्यदेशं च दक्षिणे कालिकेऽवतु ।
क्रीं स्वाहा पातु पृष्ठं तु कालिका सा दशाक्षरी ।।7।।
ह्रीं क्रीं दक्षिणे कालिके हुँ ह्रीं पातु कटिद्वयम् ।
काली दशाक्षरी विद्या स्वाहा पातूरुयुग्मकम् ।।8।।
ॐ ह्रीं क्रीं मे स्वाहा पातु कालिका जानुनी मम।
काली हन्नामविधेयं चतुर्वर्ग फलप्रदा ।।9।।
क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं पातु गुल्फं दक्षिणे कालिके सदा ।
क्रीं हुँ स्वाहा पदं पातु चतुर्दशाक्षरी मम ।।10।।
खड्गमुंडधरा काली वरदाऽभयधारिणी ।
विद्याभि: सकलाभि: सा सर्वांगमभितोऽवतु ।।11।।
काली कपालिनी कुल्ला कुरुकुल्ला विरोधिनी ।
विप्रचित्ता तथोग्रोग्रप्रभादीप्ता घनत्विषा ।।12।।
नीला घना बालिका च माता मुद्रामितप्रभा ।
एता: सर्वा: खड्गधरा मुंडमाला – विभूषिता: ।
रक्षन्तु मां दिक्षु देवी ब्राह्मी नारायणी तथा ।।13।।
माहेश्वरी च चामुण्डा कौमारी चापराजिता ।
वाराही नारसिंही च सर्वाश्चामित-भूषणा: ।।14।।
रक्षन्तु स्वायुधैर्दिक्षु मां विर्दिक्षु यथा तथा ।
पूर्ण आस्था के साथ ग्यारह दिन तक काली मंत्र जप करें। नित्य जाप करने से पहले संक्षिप्त पूजन अवश्य करें। साधना के बारे में जानकारी गुप्त रखें। ग्यारह दिन तक मन्त्र का जाप करने के बाद जिस मन्त्र का आपने जाप किया है उसका दशांश या संक्षिप्त हवन छोटी काली मिर्च, पांच मेवा, शुद्ध घी, हवन समग्री में मिलाकर करें। हवन के पश्चात् महाकाली यंत्र को अपने घर से दक्षिण दिशा की ओर किसी शिव मंदिर में दान कर दें और बाकि बची पूजा सामग्री को नदी या किसी पीपल के नीचे विसर्जन कर दें।
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